Nobel Peace Prize 2026: नवी पिल्लै को पुरस्कार, इजरायल क्यों नाराज और ट्रंप क्यों रह गए पीछे?

Oct 10, 2026 - 22:05
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Nobel Peace Prize 2026: नवी पिल्लै को पुरस्कार, इजरायल क्यों नाराज और ट्रंप क्यों रह गए पीछे?

दक्षिण अफ्रीका की वरिष्ठ न्यायविद नवी पिल्लै को अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है. गाजा में नरसंहार के आरोपों की जांच करने वाले संयुक्त राष्ट्र आयोग की अध्यक्ष रह चुकीं पिल्लै के चयन पर इजरायल ने कड़ी आपत्ति जताई. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी इस बार पुरस्कार नहीं मिला.

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नोबेल शांति पुरस्कार 2026 की घोषणा से क्यों मचा विवाद?

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शांति सम्मानों में शामिल नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर इस बार बहस केवल विजेता के नाम तक सीमित नहीं है. 9 अक्टूबर 2026 को नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने दक्षिण अफ्रीका की न्यायविद नवी पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की.

समिति के अनुसार, पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों तथा नरसंहार के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब गाजा युद्ध, अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों की भूमिका और शक्तिशाली देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव डालने के सवाल लगातार चर्चा में हैं.

पिल्लै का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह संयुक्त राष्ट्र के उस स्वतंत्र जांच आयोग की अध्यक्ष रह चुकी हैं, जिसने गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर गंभीर कानूनी निष्कर्ष दिए थे.

कौन हैं नवी पिल्लै, जिन्हें मिला नोबेल पुरस्कार?

नवी पिल्लै का पूरा नाम नवनेथम पिल्लै है. उनका जन्म 1941 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था. रंगभेद की व्यवस्था के बीच पली-बढ़ीं पिल्लै ने कानून को अपना पेशा बनाया और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई.

नवी पिल्लै
नवी पिल्लै

उनके करियर की तीन प्रमुख उपलब्धियां हैं.

  • रंगभेद के खिलाफ संघर्ष: दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते हुए उन्होंने रंगभेद व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाले लोगों की पैरवी की.
  • अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय: वह रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश रहीं.
  • संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार: 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया.

रवांडा नरसंहार से जुड़े मुकदमों में उनकी भूमिका ने यौन हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसे अपराधों की अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझ को मजबूत करने में योगदान दिया.

नोबेल समिति ने उनके लंबे न्यायिक करियर और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता को सम्मान का आधार बताया है.

गाजा पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट और विवाद की जड़

पिल्लै 2021 से नवंबर 2025 तक फिलिस्तीनी क्षेत्रों, पूर्वी यरुशलम और इजरायल से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्ष रहीं.

यह आयोग 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाजा में इजरायली सैन्य कार्रवाई से जुड़े कथित अंतरराष्ट्रीय अपराधों की जांच करता रहा.

जून 2024 में आयोग ने कहा कि 7 अक्टूबर के हमलों और उसके बाद की सैन्य कार्रवाई के दौरान हमास तथा इजरायल, दोनों की ओर से युद्ध अपराध किए गए.

इसके बाद 16 सितंबर 2025 को आयोग ने अपनी विस्तृत कानूनी जांच के आधार पर निष्कर्ष दिया कि गाजा में इजरायली अधिकारियों और सुरक्षा बलों ने नरसंहार के चार कृत्य किए और उनके पीछे फिलिस्तीनियों को समूह के रूप में नष्ट करने का विशिष्ट इरादा था.

आयोग ने हत्या, गंभीर शारीरिक या मानसिक क्षति, जीवन को नष्ट करने वाली परिस्थितियां पैदा करने और जन्म रोकने के उद्देश्य से उपायों को नरसंहार संबंधी कृत्यों के रूप में पहचाना.

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. ये संयुक्त राष्ट्र के जांच आयोग के निष्कर्ष हैं. इन्हें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अंतिम फैसले के समान नहीं माना जाना चाहिए. इजरायल ने इन आरोपों को खारिज किया है.

इजरायल और उसके समर्थकों की नाराजगी क्यों?

नवी पिल्लै को पुरस्कार मिलने के बाद इजरायल सरकार की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही. इजरायल के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को इजरायल-विरोधी नफरत और पूर्वाग्रह को वैधता देने वाला कदम बताया. इजरायली पक्ष ने गाजा पर आयोग के निष्कर्षों को भी खारिज किया है.

PM बेंजामिन नेतन्याहू, फोटो पीटीआई
PM बेंजामिन नेतन्याहू, फोटो पीटीआई

इजरायल के आलोचकों और समर्थकों के बीच इस विवाद को समझने के लिए तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं.

  • पहला, नरसंहार का आरोप: इजरायल का कहना है कि गाजा पर लगाए गए आरोप अनुचित हैं और उसकी सैन्य कार्रवाई को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं. दूसरी ओर, पिल्लै की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपने निष्कर्षों के समर्थन में सैन्य कार्रवाई, नागरिकों की स्थिति, मानवीय सहायता पर प्रतिबंधों और इजरायली अधिकारियों के बयानों का विश्लेषण किया.
  • दूसरा, संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता पर सवाल: इजरायल और उसके समर्थक लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की कुछ संस्थाओं पर इजरायल के प्रति पक्षपात का आरोप लगाते रहे हैं. पिल्लै की अध्यक्षता वाले आयोग को लेकर भी ऐसी आलोचना हुई. पिल्लै ने अपने काम का बचाव करते हुए इसे साक्ष्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित जांच बताया.
  • तीसरा, अंतरराष्ट्रीय न्याय की राजनीति: पिल्लै का करियर अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं से जुड़ा रहा है. इसलिए उनका सम्मान उन लोगों को न्याय और जवाबदेही की मजबूती के रूप में दिखाई देता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करते हैं. वहीं, इजरायल सरकार के आलोचकों के अनुसार, पुरस्कार पर उसकी प्रतिक्रिया इस बात को उजागर करती है कि गाजा विवाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और राष्ट्रीय सरकारों के बीच कितना बड़ा टकराव बन चुका है.

हालांकि, इजरायल सरकार, सभी यहूदी समुदायों और सभी इजरायल समर्थकों की राय को एक जैसा मानना गलत होगा. इसी तरह, इजरायल की सरकारी नीतियों की आलोचना और यहूदी-विरोधी भावना के बीच भी अंतर करना जरूरी है.

2022 में 'यहूदी लॉबी' संबंधी टिप्पणी पर भी हुआ था विवाद

पिल्लै की अध्यक्षता वाले आयोग को पहले भी विवादों का सामना करना पड़ा था.

जुलाई 2022 में आयोग के सदस्य मिलून कोठारी ने सोशल मीडिया को नियंत्रित करने वाली 'यहूदी लॉबी' का उल्लेख किया था. पिल्लै ने कहा था कि कोठारी की टिप्पणी को संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया गया.

इस घटना के बाद आयोग की विश्वसनीयता और उसके सदस्यों की टिप्पणियों पर बहस हुई. इजरायल समर्थक कुछ आलोचकों ने पिल्लै के बयानों और आयोग की जांच को पक्षपाती बताया. यरुशलम सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स जैसे संस्थानों ने उनकी कुछ टिप्पणियों को यहूदी-विरोधी करार दिया.

पिल्लै और आयोग के काम का समर्थन करने वालों का तर्क रहा है कि किसी सरकार की नीतियों की कानूनी जांच को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि उसके निष्कर्ष राजनीतिक रूप से असुविधाजनक हैं.

यह विवाद दिखाता है कि गाजा युद्ध को लेकर बहस केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है. इसमें मीडिया, अंतरराष्ट्रीय कानून, यहूदी-विरोध के आरोप और मानवाधिकारों की जवाबदेही जैसे सवाल भी शामिल हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं मिला?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुरस्कार मिलने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर की थी. उन्होंने अपने कूटनीतिक प्रयासों और संघर्षों को समाप्त करने के दावों का उल्लेख करते हुए कहा था कि वह सम्मान के हकदार हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

लेकिन 2026 में नोबेल समिति ने उनका चयन नहीं किया. इसके पीछे किसी एक आधिकारिक कारण की पुष्टि नहीं हुई है. समिति अपने विचार-विमर्श और उम्मीदवारों के आकलन को 50 वर्षों तक गोपनीय रखती है.

फिर भी, इस साल के घटनाक्रम से कुछ महत्वपूर्ण संदर्भ सामने आते हैं.

  • युद्ध और शांति के बीच विरोधाभास: ट्रंप प्रशासन के ईरान के साथ सैन्य टकराव के संदर्भ में उनकी शांति संबंधी दावेदारी पर सवाल उठे. रॉयटर्स ने पुरस्कार की घोषणा से पहले रिपोर्ट किया था कि ईरान के साथ संघर्ष और यूक्रेन में स्थायी शांति स्थापित न होने से ट्रंप की संभावनाओं को लेकर विशेषज्ञों में संदेह था.
  • कूटनीतिक दावों और परिणामों का अंतर: किसी नेता द्वारा कई संघर्ष समाप्त करने का दावा अपने आप में पर्याप्त नहीं है. ऐसे दावों का आकलन वास्तविक समझौतों, उनके क्रियान्वयन और शांति की स्थिरता के आधार पर किया जा सकता है.
  • अंतरराष्ट्रीय कानून की अहमियत: इस वर्ष पिल्लै के चयन में नोबेल समिति ने अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था और जवाबदेही को स्पष्ट प्राथमिकता दी. ट्रंप प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं के बीच तनाव ने इस चयन को व्यापक राजनीतिक संदर्भ दिया.

इन तथ्यों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि समिति ने किसी एक नीति या विवाद के कारण ट्रंप को पुरस्कार नहीं दिया. आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई कारण घोषित नहीं किया गया है.

क्या ट्रंप ने पुरस्कार मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी?

नहीं. पुरस्कार की घोषणा से पहले ट्रंप ने अपनी दावेदारी सार्वजनिक रूप से दोहराई थी और कहा था कि उन्हें नहीं पता कि समिति क्या फैसला करेगी.

पुरस्कार पिल्लै को दिए जाने के बाद ट्रंप ने नोबेल समिति के फैसले की आलोचना की. 10 अक्टूबर को रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने नॉर्वे पर भी नाराजगी जताई और पुरस्कार न मिलने को अपमानजनक बताया.

इससे स्पष्ट है कि ट्रंप के लिए यह मुद्दा केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मान तक सीमित नहीं था; वह इसे अपने कूटनीतिक रिकॉर्ड की मान्यता के रूप में भी पेश करते रहे हैं.

हालांकि, किसी नेता की नाराजगी या पुरस्कार की सार्वजनिक दावेदारी चयन प्रक्रिया का निर्णायक प्रमाण नहीं है.

इस पुरस्कार का वैश्विक राजनीति के लिए क्या अर्थ है?

नवी पिल्लै को मिला नोबेल शांति पुरस्कार तीन बड़े सवाल सामने रखता है.

  • पहला, क्या शांति का अर्थ केवल युद्धविराम और नेताओं के बीच समझौते हैं, या इसके लिए मानवाधिकारों और कानूनी जवाबदेही की भी जरूरत है?
  • दूसरा, क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शक्तिशाली देशों और उनके नेताओं को भी जवाबदेह ठहरा सकती हैं?
  • तीसरा, क्या किसी विवादित संघर्ष पर कानूनी निष्कर्ष देने वाले व्यक्ति को सम्मानित करना न्याय की प्रक्रिया को मजबूत करता है, या इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के राजनीतिकरण की बहस और तेज होती है?

नोबेल समिति ने पिल्लै के चयन के जरिए अंतरराष्ट्रीय कानून को शांति की बुनियाद बताया है. इजरायल की प्रतिक्रिया और ट्रंप की नाराजगी इस निर्णय को और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है.

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