SIR विवाद पर DW से Al Jazeera तक, भारत के चुनाव आयोग को लेकर क्या कह रही दुनिया?
भारत में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का विरोध अब केवल घरेलू राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है. Special Intensive Revision यानी SIR के तहत मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव, चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भारत की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जोड़कर देखना शुरू कर दिया है.
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BBC ने इसे 'credibility crisis' के रूप में देखा
BBC की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग को लेकर पैदा हुए विवाद को सीधे credibility crisis यानी विश्वसनीयता के संकट के संदर्भ में रखा.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की तीन सदस्यीय चुनाव आयोग व्यवस्था में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से लगातार आपत्तियां सामने आना संस्थागत दृष्टि से असामान्य है. BBC ने मतदाता डेटाबेस की अखंडता, नए मतदाताओं के पंजीकरण और चुनावी रिकॉर्ड की सुरक्षा से जुड़े सवालों को प्रमुखता दी.
BBC की दूसरी रिपोर्ट में विवाद के एक अलग पहलू—युवा और सोशल मीडिया आधारित 'Cockroach' आंदोलन—पर भी ध्यान दिया गया है. यह समूह अब चुनाव प्रमुख के इस्तीफे और चुनावी सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर है.
इस तरह BBC की कवरेज में दो समानांतर तस्वीरें दिखाई देती हैं—एक तरफ चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल और दूसरी तरफ युवा वर्ग का राजनीतिक रूप से सक्रिय होना.
DW की नजर में SIR और संस्थागत भरोसे का संकट
जर्मन मीडिया संस्थान Deutsche Welle ने भी SIR विवाद को चुनावी संस्थाओं में भरोसे के सवाल से जोड़ा है.
DW के अनुसार, विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान करोड़ों नाम मतदाता सूची से हटाए गए. दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची में पात्र मतदाताओं को बनाए रखना और अपात्र नामों को हटाना है.
DW ने चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेदों को भी प्रमुखता दी है. रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने SIR से संबंधित कई फैसलों पर आपत्ति दर्ज की थी.

दिलचस्प बात यह है कि विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों को फिर से सूची में शामिल करने के लिए विशेष अभियान की घोषणा की, जिनके नाम SIR के दौरान छूट गए थे. बूथ लेवल अधिकारी पुराने और मौजूदा रिकॉर्ड की तुलना कर ऐसे लोगों की पहचान करेंगे और पात्र पाए जाने पर उनका Form-6 भरवाने में मदद करेंगे.
यानी विवाद के बीच चुनाव आयोग को correction mechanism पर भी जोर देना पड़ा है.
The Times: मामला सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं
ब्रिटेन के The Times ने भी SIR के तहत 130 मिलियन से अधिक नाम हटाए जाने और उसके खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को प्रमुखता दी है.
रिपोर्ट में विपक्ष और युवा आंदोलन के आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आलोचक इसे वैध मतदाताओं के disenfranchisement यानी मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने के खतरे के रूप में देखते हैं.
वहीं चुनाव आयोग का पक्ष यह है कि अभियान का उद्देश्य मृत, डुप्लीकेट और अपात्र मतदाताओं को हटाकर सूची को साफ करना है.
यही अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग का सबसे अहम पहलू है—आरोप और आधिकारिक पक्ष दोनों साथ मौजूद हैं.
Reuters: मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के लिए राजनीतिक चुनौती?
Reuters ने इस विवाद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के बीच उभरते राजनीतिक दबाव के संदर्भ में देखा है.
रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी दलों के साथ-साथ युवा समूह भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. चुनाव आयोग और BJP ने मतदाता सूची में किसी राजनीतिक हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है.
यानी अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए विवाद का एक दूसरा आयाम भी है—क्या चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल मोदी सरकार के लिए व्यापक राजनीतिक संकट में बदल सकते हैं?

फिलहाल इसका जवाब आसान नहीं है. लेकिन इतना स्पष्ट है कि विपक्ष ने इस मुद्दे को 'vote chori' और लोकतंत्र की रक्षा के राजनीतिक नैरेटिव में बदल दिया है.
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू न्यायिक निगरानी भी है.
SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की मांग हुई है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी अदालत की भूमिका को इस विवाद के महत्वपूर्ण संस्थागत counterweight के रूप में देखा है.
The Guardian ने भी मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव और उसके बाद पैदा हुए विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और चुनावी संस्था से जवाब मांगे जाने को प्रमुखता दी.
इससे विवाद का रास्ता केवल संसद और सड़क तक सीमित नहीं रह जाता. अब इसकी अगली बड़ी लड़ाई अदालत, चुनाव आयोग और राजनीतिक विपक्ष—तीनों संस्थागत मोर्चों पर दिखाई दे रही है.
दुनिया की नजर में असली सवाल क्या है?
इस पूरे विवाद को अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने अलग-अलग कोणों से देखा है.
BBC के लिए मुख्य सवाल चुनाव आयोग की credibility है.
DW के लिए SIR, संस्थागत मतभेद और voter inclusion/exclusion महत्वपूर्ण हैं.
Al Jazeera ने Gen-Z और Cockroach आंदोलन को प्रमुखता दी है.
AP भी मुद्दे को report करता है. साथ ही ECI और BJP का पक्ष भी देता है कि exercise का उद्देश्य duplicate/ineligible entries हटाना है.

Reuters ने इसे मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के दौरान उभरती राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा है.
और The Guardian ने न्यायपालिका की भूमिका को प्रमुखता दी है.
यानी अंतरराष्ट्रीय कवरेज का साझा सूत्र केवल यह नहीं है कि 'भारत में विपक्ष प्रदर्शन कर रहा है'.
बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता सूची तैयार करने वाली संस्था पर जनता का भरोसा कितना मजबूत है. चुनाव में हार-जीत राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन किसे वोट देने का अधिकार है, यह तय करने वाली सूची पर भरोसा टूटना—किसी भी लोकतंत्र के लिए उससे कहीं बड़ा सवाल होता है.
यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार और SIR का विवाद अब सिर्फ दिल्ली की सड़कों की खबर नहीं है. यह भारत की चुनावी व्यवस्था और उसकी वैश्विक लोकतांत्रिक छवि को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन चुका है.
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