Black Sea से Strait of Hormuz तक संकट: भारत-ASEAN के लिए क्यों जरूरी है सुरक्षित समुद्री रास्ता?

Oct 09, 2026 - 11:52
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Black Sea से Strait of Hormuz तक संकट: भारत-ASEAN के लिए क्यों जरूरी है सुरक्षित समुद्री रास्ता?

दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए समुद्र केवल व्यापार का रास्ता नहीं, बल्कि उसकी जीवनरेखा है. लेकिन हाल के वर्षों में Black Sea, Red Sea और Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में पैदा हुए संकट ने इस जीवनरेखा की कमजोरियों को उजागर कर दिया है. युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने समुद्री परिवहन की लागत बढ़ाई है और वैश्विक सप्लाई चेन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं.

हाल ही में नई दिल्ली में Chintan Research Foundation की ओर से आयोजित 'Strengthening India-ASEAN Maritime Cooperation in the Indo-Pacific' सम्मेलन में विशेषज्ञों ने इसी चुनौती पर चर्चा की. सम्मेलन का केंद्रीय संदेश स्पष्ट था—सुरक्षित समुद्री मार्ग केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और साझा समृद्धि की शर्त हैं.

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VLCC का किराया 10 गुना, कंटेनर शिप 5 गुना महंगा

सम्मेलन में पूर्व संयुक्त सचिव, Ministry of Ports, Shipping and Waterways आर. लक्ष्मणन ने समुद्री संकट के आर्थिक प्रभाव की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने बताया कि संकट के दौर में VLCC (Very Large Crude Carrier) को किराये पर लेने की लागत प्री-क्राइसिस दौर की तुलना में करीब 10 गुना तक बढ़ गई है, जबकि कंटेनर शिप की लागत करीब पांच गुना बढ़ी है.

इसका असर केवल शिपिंग कंपनियों तक सीमित नहीं रहता. महंगी समुद्री ढुलाई का सीधा प्रभाव मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा लागत और पूरी सप्लाई चेन पर पड़ता है.

यही वजह है कि आज समुद्री सुरक्षा को केवल नौसेना या तटरक्षक बल का विषय मानना पर्याप्त नहीं है. यह व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक लचीलेपन यानी supply-chain resilience से भी जुड़ गया है.

समुद्री संकट का एक सबक: विकल्प तैयार रखना

Black Sea, Red Sea और Hormuz जैसे chokepoints में व्यवधान ने भारत सहित Indo-Pacific देशों को एक महत्वपूर्ण सबक दिया है—वैकल्पिक समुद्री और व्यापारिक रास्ते अब विकल्प नहीं, रणनीतिक प्राथमिकता हैं.

किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है. ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह वैकल्पिक सप्लाई रूट, पूर्वी तट के बंदरगाहों की क्षमता, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को मजबूत करे.

विशेषकर Andaman and Nicobar Islands भारत की Indo-Pacific रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच स्थित यह क्षेत्र भारत को समुद्री निगरानी, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग के लिहाज से रणनीतिक बढ़त देता है.

IFC-IOR को सिर्फ सुरक्षा तक सीमित क्यों न रखा जाए?

सम्मेलन में सूचना-साझाकरण को समुद्री संकट से निपटने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया.

आर. लक्ष्मणन ने सुझाव दिया कि Information Fusion Centre–Indian Ocean Region (IFC-IOR) की भूमिका को और व्यापक किया जा सकता है. फिलहाल IFC-IOR मुख्य रूप से सुरक्षा, नौसेना और तटरक्षक गतिविधियों से जुड़ी maritime information को monitor करता है.

लेकिन इसमें port authorities और customs agencies को भी जोड़ा जाए तो commercial shipping और trade disruptions की जानकारी को भी साझा किया जा सकता है.

इसका फायदा यह होगा कि किसी समुद्री मार्ग पर संकट आने की स्थिति में सरकारें और व्यापारिक संस्थाएं जल्दी पता लगा सकेंगी कि किस route पर कितना व्यवधान है, कौन से वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हैं और supply chain को किस तरह पुनर्गठित किया जा सकता है.

यानी Maritime Domain Awareness को Security Domain से आगे बढ़ाकर Commercial Domain तक ले जाने की जरूरत है.

भारत-ASEAN क्यों महत्वपूर्ण?

भारत और ASEAN के बीच समुद्री सहयोग की बुनियाद केवल रणनीतिक हितों पर नहीं, बल्कि भूगोल और आर्थिक परस्पर निर्भरता पर भी टिकी है.

हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाले समुद्री रास्ते भारत और ASEAN देशों के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसलिए समुद्र की सुरक्षा दोनों के साझा आर्थिक हित में है.

राजदूत जयदीप मजूमदार ने सम्मेलन में कहा कि India-ASEAN maritime cooperation अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि एक structured और multidimensional partnership बन चुका है. अब चुनौती इस convergence को tangible outcomes में बदलने की है.

यानी सवाल यह नहीं है कि भारत और ASEAN के बीच कितने संवाद और समझौते हैं. बड़ा सवाल यह है कि संकट के समय ये व्यवस्थाएं जमीन पर कितनी तेजी से काम करती हैं.

AOIP, IPOI और MAHASAGAR के बीच बेहतर तालमेल

भारत और ASEAN के पास पहले से ही कई ऐसे frameworks हैं जो Indo-Pacific में सहयोग की दिशा तय करते हैं.

इनमें प्रमुख हैं—

  • ASEAN Outlook on the Indo-Pacific (AOIP)
  • India's Indo-Pacific Oceans Initiative (IPOI)
  • Act East Policy
  • MAHASAGAR

अब आवश्यकता इन पहलों के बीच बेहतर practical convergence की है.

Maritime security, supply-chain resilience, energy cooperation और connectivity जैसे क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाएं इस सहयोग को अधिक प्रभावी बना सकती हैं.

Hormuz संकट ने क्या चेतावनी दी?

सम्मेलन में फरवरी 2026 के Strait of Hormuz crisis को विशेष रूप से महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर देखा गया. Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण energy chokepoints में से एक है. यहां पैदा होने वाला व्यवधान केवल आसपास के देशों को नहीं, बल्कि दूर-दराज के देशों की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार को भी प्रभावित कर सकता है.

यही interconnected vulnerability भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है.

इसलिए भारत को—

ऊर्जा स्रोतों में विविधता, वैकल्पिक trade routes, पूर्वी तट के ports की क्षमता, alternative connectivity corridors और बेहतर maritime information-sharing पर समानांतर रूप से काम करना होगा.

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सिर्फ नौसेना नहीं, Coast Guard और नागरिक एजेंसियों की भी भूमिका

समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केवल naval cooperation पर्याप्त नहीं होगा.

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सुरक्षित समुद्र का मतलब साझा आर्थिक विकास

Vice Admiral Shekhar Sinha (Retd.) ने सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण बात कही—'Oceans must remain open for shared growth.'

दरअसल यही भारत-ASEAN maritime cooperation का व्यापक आधार बन सकता है.

समुद्र जितना सुरक्षित होगा, व्यापार उतना निर्बाध होगा। व्यापार जितना निर्बाध होगा, supply chains उतनी resilient होंगी. और supply chains जितनी मजबूत होंगी, आर्थिक विकास उतना स्थिर रहेगा.

इसलिए Indo-Pacific में maritime security को केवल सैन्य शक्ति के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं है. यह economic security, energy security और strategic autonomy से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है.

2027 में 35 साल की साझेदारी, अब अगला कदम क्या?

भारत और ASEAN की dialogue partnership 2027 में 35 वर्ष पूरे करने जा रही है. तीन दशक से अधिक की इस साझेदारी ने राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर एक मजबूत आधार तैयार किया है.

अब अगली चुनौती इस institutional foundation को continuous operational cooperation में बदलने की है.

Black Sea, Red Sea और Hormuz जैसे संकटों ने दिखाया है कि समुद्री व्यवधान कहीं भी हो सकता है और उसका असर बहुत दूर तक पहुंच सकता है.

ऐसे में भारत और ASEAN के लिए संदेश स्पष्ट है—समुद्री रास्तों की सुरक्षा अब केवल maritime security का प्रश्न नहीं है। यह व्यापार, ऊर्जा, supply chains और साझा विकास की सुरक्षा का प्रश्न है.

और Indo-Pacific में अगर समुद्र साझा विकास का माध्यम है, तो उसकी सुरक्षा भी साझा जिम्मेदारी बननी होगी.

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