बिन शादी मांग में किसके नाम का सिंदूर भरती थीं लता मंगेशकर? खुद बताया था राज

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर संगीत और रंगमंच की दुनिया से जुड़े हुए थे। घर का माहौल पूरी तरह संगीतमय था और लता ने बहुत कम उम्र में ही संगीत को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया था। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। उस समय लता महज 13 साल की थीं।
लता मंगेशकर अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनकी बहनों में आशा भोसले, उषा और मीना मंगेशकर शामिल थीं, जबकि उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर हैं। पिता के जाने के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां बढ़ गईं और लता ने काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने अभिनय और गायन दोनों के जरिए परिवार को संभाला।
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लता ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने शादी के बारे में कभी गंभीरता से सोचने का समय ही नहीं पाया। उनके मुताबिक कम उम्र में काम शुरू करने और परिवार की जिम्मेदारी के कारण शादी का ख्याल पीछे छूट गया। 1999 के एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि 13 साल की उम्र में काम शुरू करने के बाद उनका ध्यान परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पर था।
बिन शादी मांग में सिंदूर लगाने की वजह क्या थी?
लता मंगेशकर ने कभी शादी नहीं की, लेकिन कई मौकों पर उनकी मांग में सिंदूर नजर आता था। यही बात लोगों के लिए लंबे समय तक जिज्ञासा का विषय बनी रही। आखिर वह बिना शादी के सिंदूर क्यों लगाती थीं? इस सवाल का एक बेहद दिलचस्प किस्सा अभिनेत्री और टीवी की मशहूर हस्ती तबस्सुम ने साझा किया था।
एक इंटरव्यू में तबस्सुम ने बताया था कि एक बार उन्होंने लता दीदी से सीधे पूछ लिया था कि जब वह अविवाहित हैं तो उनकी मांग में सिंदूर किसके नाम का है।तबस्सुम के मुताबिक, उनके सवाल पर लता मंगेशकर पहले मुस्कुराईं। इसके बाद उन्होंने अपने जवाब से इस पूरे सवाल को ही एक अलग अर्थ दे दिया। लता जी ने कहा था कि 'संगीत ही उनका सबकुछ है।'
तबस्सुम ने बताया था कि लता मंगेशकर का कहना था कि अगर संगीत नहीं है तो वह भी नहीं हैं। जिस तरह लोग पति को परमेश्वर मानकर मांग में सिंदूर भरते हैं, उसी तरह उनके लिए संगीत ही परमेश्वर था। इसलिए वह संगीत के नाम का सिंदूर अपनी मांग में भरती थीं।
लता मंगेशकर के जीवन को करीब से देखने पर यह बात और भी स्पष्ट होती है कि संगीत उनके लिए केवल करियर नहीं था। उन्होंने बचपन से लेकर जीवन के अंतिम दौर तक रियाज और गायन को अपनी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बनाए रखा। 1999 के इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा था कि वह अकेले रहने, पूजा करने और रियाज करने में खुश थीं और उन्हें अपने अविवाहित रहने के फैसले का पछतावा नहीं था।
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