हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

हिंदी दिवस पर हम अत्यंत आत्मविश्वास के साथ हिंदी की गरिमा, महिमा और उसके अप्रतिम गौरव का गुणगान तो करते हैं, किंतु वास्तव में हम इसकी वर्तमान दशा को लेकर अपेक्षित रूप से गंभीर नहीं होते। जबकि यह दिन हमारे आत्म-मूल्यांकन और आत्म-विश्लेषण का है कि हमने हिंदी के भविष्य को स्वर्णिम बनाने की दिशा में क्या महती योगदान दिया है।
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यह निर्विवाद है कि हिंदी हमारी अस्मिता की पहचान और भारत की आत्मा है। यह हमारी सांस्कृतिक चेतना को सूक्ष्मता से अभिव्यक्त करने वाली अनमोल संपदा है। यह हमारे सार्वभौमिक मूल्यों की संरक्षिका है, जो समग्र राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोती है। हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक विरासत की संवाहिका है। यह 'वसुधैव कुटुंबकम' अर्थात् वैश्विक बंधुत्व और एकता की भावना को जाग्रत कर जन-जन में आत्म-सम्मान का भाव भरती है। परस्पर सम्मान, जुड़ाव, विनम्रता, सहिष्णुता, संवेदनशीलता और समरसता हिंदी की अंतर्निहित प्रकृति है। इसी कारण यह जन-जन की अभिलाषा के अनुरूप पूरे राष्ट्र की संपर्क भाषा बनी है।
मध्यकाल में हिंदी भक्ति आंदोलन के धार्मिक और सामाजिक सुधारों का माध्यम बनी तथा स्वाधीनता संग्राम के राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरित करने वाले आदर्शों को इसने सशक्त स्वर दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लंबे संघर्ष के बाद 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया कि 'संघ की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी।' हालांकि, संविधान लागू होने के समय से 15 वर्षों की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति भी दी गई।
अनुच्छेद 343 की धारा 3 में यह व्यवस्था थी कि संसद 15 वर्ष की अवधि के पश्चात विधि द्वारा अंग्रेजी के प्रयोग को बढ़ा सकेगी। खेर आयोग और पंत समिति की रिपोर्टों के आधार पर 1963 में राजभाषा अधिनियम बनाकर यह प्रावधान कर दिया गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। इसमें यह शर्त जोड़ दी गई कि अंग्रेजी तब तक बनी रहेगी जब तक हिंदी को राजभाषा अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमंडल इसे समाप्त करने का संकल्प पारित न कर दें। इस व्यवस्था ने अंग्रेजी के प्रयोग को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया और एक भी राज्य की असहमति पर हिंदी अनिवार्य राजकाज की भाषा बनने से वंचित रह गई।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भाषा के प्रश्न को केवल भावुकता से नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखा। संस्कृत हो या हिंदी, उनका मानना था कि ये भाषाएं भारत को एकता के सूत्र में बांधकर भाषाई विवादों से बचा सकती हैं। 9 भाषाओं के ज्ञाता और 32 उपाधियों के धारक डॉ. आंबेडकर ने अंग्रेजी के बजाय हिंदी में समाचार पत्र निकाले, जिससे वे वंचित समाज की मुखर आवाज बन सके। वे प्रांतीय भाषाओं के विकास के पक्षधर थे, किंतु राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का ही समर्थन करते थे। भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के विरोधी डॉ. आंबेडकर ने 'एक भाषा-एक राज्य' के स्थान पर 'एक राज्य-एक भाषा' की अवधारणा का समर्थन किया था।
हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर हिंदी की स्वीकार्यता को रेखांकित किया था:
महात्मा गांधी: "यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है। राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।"
नेताजी सुभाष चंद्र बोस: "प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी किसी अन्य साधन से नहीं।"
महर्षि दयानंद सरस्वती: "हिंदी के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।"
के. एम. मुंशी: "हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो पहले से ही है।"
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा था—
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
पै निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥"
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसी मूलमंत्र को स्वीकारते हुए मातृभाषाओं और लोकभाषाओं को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक विशेष स्थान दिया गया है। हालांकि, मातृभाषा में शिक्षा का क्रियान्वयन पर्याप्त मानवीय और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। हिंदी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह केवल प्राथमिक शिक्षा तक सीमित न रहकर वैश्विक विश्वविद्यालयों में उच्च स्तरीय शोध और ज्ञान की बुनियाद बने।
किसी भाषा का भविष्य केवल शासकीय आदेशों या तंत्र पर निर्भर नहीं होता; वह भाषा-भाषियों के सृजनात्मक समर्पण, अपनत्व और निस्वार्थ संकल्प-शक्ति से जीवंत रहता है। यदि हमारा हिंदी-प्रेम केवल 14 सितंबर के उत्सव तक सीमित है, तो हमें आत्मचिंतन की आवश्यकता है।
मनुस्मृति का कथन है- "धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः" (जो धर्म का नाश करता है, उसका नाश हो जाता है और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है)। भाषा के संदर्भ में भी यही सत्य है—जो समाज अपनी भाषा की उपेक्षा करता है, उसकी संस्कृति का क्षरण निश्चित है।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि "अन्य भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी।" अतः हिंदी का यह दायित्व है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को सहेली मानकर परस्पर सम्मान, सहयोग और आदान-प्रदान का वातावरण बनाए।
आज सूचना प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के डिजिटल युग में हिंदी के समक्ष अनंत संभावनाएं हैं। एक तरफ जहां सूचनाओं का विशाल भंडार है, वहीं फर्जी व गुणवत्ताहीन सामग्री से बचकर प्रामाणिक ज्ञान का चयन करना एक बड़ी चुनौती है। डिजिटल दुनिया में अपनी उपादेयता बनाए रखने के लिए हिंदी में उच्चस्तरीय ज्ञान-कौशल और समृद्ध डिजिटल सामग्री का निर्माण अनिवार्य है।
हिंदी के सर्वांगीण विकास के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर एकीकृत प्रयासों की आवश्यकता है। आधुनिक विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, एआई, अर्थशास्त्र, खगोल, भूगोल और दर्शन जैसे विषयों पर हिंदी में मौलिक व प्रामाणिक ग्रंथों का सृजन युद्ध स्तर पर होना चाहिए।
जिस दिन हिंदी रोजगार की कुंजी और अंतरराष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान का प्रवेश द्वार बन जाएगी, उसी दिन 'हिंदी दिवस' का आयोजन सही मायनों में सार्थक होगा।
कोटि-कोटि कंठों की भाषा,
जन-गण की मुखरित अभिलाषा।
हिंदी है पहचान हमारी,
हिंदी है हम सबकी परिभाषा॥
लेखक: डॉ. अशोक कुमार भार्गव (पूर्व आईएएस)
संपर्क: 9425427525 | ईमेल: dr.ak.bhargava2022@gmail.com
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