कैसे लगेगा मिजोरम में नशे के सामान की तस्करी पर अंकुश?

पूर्वोत्तर का सीमावर्ती राज्य मिजोरम पड़ोसी म्यांमार से नशीली वस्तुओं की तस्करी का केंद्र बनता जा रहा है। बीते आठ महीने में ही करीब साढ़े आठ सौ करोड़ की नशीली वस्तुएं जब्त की गई हैं और 900 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई हैं। ALSO READ: क्या ऑफिस में प्रमोशन नहीं चाहती महिलाएं?
भारत में केंद्र सरकार द्वारा इस अगस्त से शुरु हुए 'नशा मुक्त भारत संकल्प अभियान' का मिजोरम समेत पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में अब तक बहुत असर नजर नहीं आया है। यह जरूर है कि इस दौरान ईडी समेत दूसरी एजेंसियों ने अपनी गतिविधियां तेज की हैं और इससे गिरफ्तारियां बढ़ी हैं।
वैसे, म्यांमार से लंबी और कई जगह खुली सीमा के कारण सीमा पार से तस्करी तो पहले भी होती रही है और यह इलाका सोने की तस्करी के लिए कुख्यात 'गोल्डेन ट्रेंगल' यानी स्वर्ण त्रिकोण के नजदीक है। लेकिन फरवरी, 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद सीमा पार से बड़े पैमाने पर शरणार्थियों के राज्य में आने के बाद यह समस्या लगातार गंभीर हुई है। नशीली वस्तुओं के जब्त होने और तस्करी के संदेह में गिरफ्तार होने वालों की तेजी से बढ़ती संख्या इसका सबूत है।
लंबी और दुर्गम सीमा ने बढ़ाई मुश्किलें
मिजोरम की करीब 510 किमी लंबी सीमा म्यांमार से सटी है। राज्य के 11 में से छह जिले म्यांमार के चिन राज्य से सटे हैं। अस्सी और नब्बे के दशक में म्यांमार को पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों की सुरक्षित शरणस्थली माना जाता था। देश में लोकतंत्र बहाल होने के बाद इसमें कुछ कमी आई थी। लेकिन सैन्य तख्तापलट और देश में लंबे समय से जारी गृहयुद्ध जैसी स्थिति ने समस्या को गंभीर बना दिया है।
बीते पांच साल यानी तख्तापलट के बाद म्यांमार से पलायन तेज हुआ है और भारी तादाद में वहां से आने वाले लोगों ने मिजोरम समेत कई राज्यों में शरण ली है। फिलहाल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के विभिन्न शरणार्थी शिविरों में करीब 31 हजार लोग रह रहे हैं।
सुरक्षा बलों ने बीते महीने ही एक अभियान के दौरान पांच करोड़ मूल्य की करीब ढाई किलो हेरोइन जब्त की थी। खुफिया विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, "नशे के इस कारोबार में हवाला नेटवर्क की भी अहम भूमिका है। ईडी ने हाल में बड़े पैमाने पर अभियान चला कर ऐसे एक नेटवर्क का खुलासा किया था और विभिन्न बैंकों में जमा करोड़ों रुपए जब्त किए थे। तस्कर गिरोह अब मादक पदार्थों की तस्करी के लिए नए रास्ते अपना रहे हैं।"
मिजोरम में पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "म्यांमार से लगी अधिकांश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ नहीं है। कई इलाके दुर्गम जंगल और नदियों से जुड़े हैं। ऐसे में सीमा पार से तस्करी रोकना बहुत मुश्किल है।" वो बताते हैं कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले तस्करों को जंगल के रूट की जानकारी होती है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियां उससे पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों में से ज्यादातर युवा रोजी-रोटी के लिए तस्करी के धंधे से जुड़ जाते हैं। उनके पास यहां रोजगार का कोई ठोस जरिया नहीं है। शिविरों में खाना-पानी तो मिल जाता है। लेकिन वहां रोजगार का कोई इंतजाम नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाल में सुरक्षा एजेंसियों का शिकंजा कसने की वजह से भारी तादाद में हेरोईन और दूसरी नशीली वस्तुएं जब्त की गई हैं और सौ से ज्यादा म्यांमारी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन इसके बावजूद इन गतिविधियों में अब तक कोई कमी नहीं आई है। एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, "अगर जब्त सामानों की कीमत आठ सौ करोड़ से ज्यादा है तो एजेंसियों की निगाहों में धूल झोंक कर देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचने वाली नशीली वस्तुओं की मात्रा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।" ALSO READ: भारत में लड़कियों के लिए कब सुरक्षित होंगे शैक्षणिक परिसर?
युवाओं में बढ़ती नशे की लत
मिजोरम का सबसे ताकतवर संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) भी इस समस्या पर अंकुश लगाने में सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिल कर काम कर रहा है। वाईएमए के प्रवक्ता वी। लालमालसावमा डीडब्ल्यू से कहते हैं, सीमा पार से बढ़ती नशीली वस्तुओं की तस्करी के कारण राज्य के युवा तबके में नशे की लत बढ़ रही है। इसके कारण यहां एचआईवी के मरीजों की तादाद भी बढ़ रही है। लेकिन सीमा खुली और दुर्गम होने के कारण इस समस्या पर पूरी तरह अंकुश लगाना मुश्किल साबित हो रहा है। वो बताते हैं, "नशे की लत के कारण इस साल अब तक दर्जनों युवकों की मौत हो चुकी है।"
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जुलाई तक राज्य में एचआईवी पॉजिटिव मरीजों की संख्या करीब 35 हजार थी। राज्य में एचआईवी की संक्रमण दर 2.75 है, जो देश में सबसे ज्यादा है।
कैसे लगेगा तस्करी की समस्या पर अंकुश?
राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है कि केंद्र और राज्य की सुरक्षा एजेंसियों ने आपसी तालमेल बढ़ाते हुए सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है। एक सरकारी प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू को बताया, "सरकार ने तीन वर्षीय नशा-विरोधी कार्य योजना शुरू की है। इसके तहत सीमावर्ती इलाकों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है और नशे की लत वाले युवाओं के इलाज के लिए पुनर्वास केंद्र खोले गए हैं।"
उनका कहना था कि इस काम में वाईएएम, चर्च, कुछ गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदाय के लोग भी शामिल हैं। ग्रामीण इलाकों में युवाओं की काउंसलिंग भी की जा रही है।
मिजोरम की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता वनरामछुआंगी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "नशीली वस्तुओं की बढ़ती तस्करी और इस्तेमाल इस खूबसूरत पर्वतीय राज्य पर सबसे बदनुमा धब्बा बन गया है। सीमा पार म्यांमार के शांत होने के कारण नशीली वस्तुओं की तस्करी तेजी से बढ़ी है।"
एक सामाजिक कार्यकर्ता डी। सापडांगा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "नशीली दवाओं के बढ़ते सेवन से युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है। ऐसे में यह सिर्फ सुरक्षा या अपराध से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। इसके दूरगामी सामाजिक नतीजे सामने आएंगे। इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र, राज्य और सामाजिक संगठनों को इस समस्या पर अंकुश लगाने की दिशा में प्रयास और तेज करना होगा।"
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