...तो क्या 12-15 हिस्सों में बंट जाएगा पाकिस्तान? जानें आसिम मुनीर का प्लान

Oct 10, 2026 - 22:05
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...तो क्या 12-15 हिस्सों में बंट जाएगा पाकिस्तान? जानें आसिम मुनीर का प्लान

पाकिस्तान मजेदार है, और उसके कर्ता-धर्ता भी बड़े अजूबे हैं. इंडोनेशिया से लेकर मोरक्को तक, यह दुनिया का इकलौता ऐसा इस्लामिक देश है जिसके दो टुकड़े हो चुके हैं. और अब 1971 में हुए बंटवारे के बाद, फिर से इसके और बंटवारे की खबरें आ रही हैं.

क्या पाकिस्तान का नक्शा एक बार फिर बदलने वाला है? क्या आर्मी चीफ आसिम मुनीर देश को 15 हिस्सों में बांटना चाहते हैं? पाकिस्तान के एडमिनिस्ट्रेटिव स्ट्रक्चर में बदलाव की चर्चाओं के बीच ये सवाल सुर्खियों में हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स में मौजूदा चार प्रांतों को छोटी यूनिट्स में बांटने के विचार को मुनीर से जोड़ा गया है. बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के छोटे-छोटे हिस्से, जो पहले से ही विद्रोहियों और असंतुष्टों से भरे हुए हैं. यह मामला सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव सुधार से कहीं आगे का है. असल में, क्या इसका मकसद भड़कते हुए विद्रोह को कंट्रोल करना और उसे दबाना है? या फिर इसका मकसद सत्ता और संसाधनों के केक को कई छोटे टुकड़ों में सियासतदानों में बांटना है?

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15 प्रांतों की चर्चा कहां से शुरू हुई?

अक्टूबर 2026 में India Today की एक रिपोर्ट ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को देश के चार बड़े प्रांतों को छोटी इकाइयों में बांटने के विचार का समर्थक बताया. रिपोर्ट ने The Economist का हवाला देते हुए इस मुद्दे को सामने रखा. इससे पाकिस्तान के राजनीतिक ढांचे में संभावित बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई.

इस बहस की एक दूसरी कड़ी सितंबर 2026 में सामने आई थी. जर्मन प्रसारक डॉयचे वेले (DW) की 7 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के योजना एवं विकास मंत्री अहसान इकबाल ने देश में 12 से 15 प्रांत बनाने अथवा लगभग 160 छोटी प्रशासनिक इकाइयों को अधिक अधिकार देने जैसे विकल्पों पर चर्चा की थी.

इसलिए नए प्रांतों का विचार केवल सेना प्रमुख से जुड़ी खबर नहीं है. यह पाकिस्तान के प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचे को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है.

पाकिस्तान के चार प्रांत ही क्यों हैं सत्ता की धुरी?

पाकिस्तान के चार प्रमुख प्रांत हैं—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान. इनके अतिरिक्त इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर तथा गिलगित-बाल्टिस्तान की अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं.

पाकिस्तान का नक्शा (AI Generated)
पाकिस्तान का नक्शा (AI Generated)

इन चार प्रांतों का आकार, जनसंख्या, संसाधन और राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे से काफी अलग हैं. पंजाब सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है और राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. सिंध आर्थिक गतिविधियों, कराची जैसे बड़े महानगर और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के राजनीतिक आधार के कारण अहम स्थान रखता है. खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान की अपनी क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां हैं.

इतने विविध क्षेत्रों को चार बड़ी प्रशासनिक इकाइयों में संचालित करने से शासन की पहुंच, संसाधनों के वितरण और स्थानीय प्रतिनिधित्व पर सवाल उठते रहे हैं.

नए प्रांत बनाने के समर्थकों का तर्क है कि छोटे प्रशासनिक क्षेत्र सरकार को नागरिकों के करीब ला सकते हैं. लेकिन प्रशासनिक सीमाएं छोटी करने से अपने आप सुशासन सुनिश्चित नहीं होता. इसके लिए पर्याप्त बजट, स्थानीय संस्थाओं को अधिकार और जवाबदेही भी जरूरी हैं.

अहसान इकबाल के प्रस्ताव में क्या है?

DW की 7 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अहसान इकबाल ने पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के लिए दो संभावित रास्तों की चर्चा की थी.

पहला रास्ता देश में 12 से 15 प्रांत बनाना है. दूसरा विकल्प लगभग 160 छोटी प्रशासनिक इकाइयों को अधिक अधिकार और संसाधन देकर शासन को विकेंद्रीकृत करना है.

दोनों प्रस्तावों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है. नए प्रांत बनाने से पाकिस्तान के संघीय ढांचे, विधानसभा क्षेत्रों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे में बदलाव आ सकता है. वहीं, मौजूदा प्रशासनिक सीमाओं के भीतर स्थानीय इकाइयों को अधिकार देना अपेक्षाकृत अलग तरह का सुधार होगा.

इस बहस का मूल प्रश्न यह है कि पाकिस्तान की समस्याएं प्रांतों के बड़े आकार से पैदा हो रही हैं या सत्ता और संसाधनों के अत्यधिक केंद्रीकरण से. यदि किसी जिले के पास स्कूल, अस्पताल और स्थानीय बुनियादी ढांचे के लिए पर्याप्त वित्तीय अधिकार ही नहीं हैं, तो नया प्रांत बनाना अकेले उस समस्या का समाधान नहीं होगा.

क्या इससे पंजाब और सिंध की राजनीतिक ताकत घटेगी?

पाकिस्तान में प्रांत केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं हैं. वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय पहचान और संसाधनों के वितरण के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं.

Nawaz Sharif and Maryam Nawaz Sharif
Nawaz Sharif and Maryam Nawaz Sharif

पंजाब की बड़ी आबादी उसे राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव देती है. यदि उसके कई छोटे प्रांत बनाए जाते हैं, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं.

इसी तरह, सिंध का पुनर्गठन वहां की क्षेत्रीय राजनीति और प्रांतीय स्वायत्तता के सवालों को प्रभावित कर सकता है.

Bilawal Bhutto
Bilawal Bhutto

आलोचकों की आशंका है कि छोटे प्रांतों के गठन से बड़े प्रांतीय राजनीतिक केंद्रों का प्रभाव कम हो सकता है और संघीय सरकार की भूमिका बढ़ सकती है. दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि इससे दूरदराज के क्षेत्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक सुविधाएं मिल सकती हैं.

इन दोनों तर्कों को अलग-अलग परखना जरूरी है. यह मान लेना कि नए प्रांत बनाने का एकमात्र उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या क्षेत्र को कमजोर करना है, उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा.

असीम मुनीर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका का लंबा इतिहास रहा है. देश ने प्रत्यक्ष सैन्य शासन के दौर देखे हैं और निर्वाचित सरकारों के समय भी राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति में सेना का प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है.

इसी पृष्ठभूमि में मुनीर की कथित भूमिका पर ध्यान दिया जा रहा है. यदि सेना का नेतृत्व वास्तव में छोटे प्रांतों के विचार का समर्थन करता है, तो बहस केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं रहेगी. यह सवाल भी उठेगा कि प्रांतीय सत्ता और संघीय केंद्र के बीच शक्ति का संतुलन किस दिशा में जा रहा है.

पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर. सोर्स-एक्स.
पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर. सोर्स-एक्स.

लेकिन किसी रिपोर्ट में सेना प्रमुख के समर्थन का उल्लेख होना और यह साबित होना कि सेना ने पुनर्गठन की योजना बना ली है—दो अलग बातें हैं. India Today की रिपोर्ट को इसी सीमा के भीतर पढ़ना चाहिए.

यहां एक और प्रश्न है: क्या प्रस्तावित बदलाव निर्वाचित संस्थाओं, प्रांतीय विधानसभाओं और स्थानीय समुदायों की सहमति से आगे बढ़ेगा? या इसे ऊपर से तय किए गए प्रशासनिक समाधान के रूप में पेश किया जाएगा? इसका उत्तर अभी उपलब्ध जानकारी से नहीं मिलता.

संविधान की राह आसान नहीं

पाकिस्तान में प्रांतों की सीमाएं बदलना सामान्य प्रशासनिक आदेश से पूरा होने वाला काम नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 239(4) के अनुसार, किसी प्रांत की सीमाओं में बदलाव करने वाले संवैधानिक संशोधन के लिए संबंधित प्रांतीय विधानसभा के कुल सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई की मंजूरी आवश्यक है. इसके साथ संघीय संसद में संवैधानिक संशोधन की निर्धारित प्रक्रिया भी पूरी करनी होती है.

इसका अर्थ है कि नए प्रांतों के गठन के लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया अनिवार्य होगी. प्रांतीय पहचान, संसाधनों के बंटवारे और राजनीतिक हितों से जुड़े विवाद इस प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं.

इसलिए 12 से 15 प्रांत बनाने की चर्चा को किसी तय सरकारी योजना या आसन्न बदलाव के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी.

क्या पाकिस्तान फिर टूटने की ओर बढ़ रहा है?

पाकिस्तान में नए प्रांतों की बहस को 1947 के विभाजन या 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के अलग होकर बांग्लादेश बनने की घटना के समान नहीं माना जाना चाहिए. उन घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं.

मौजूदा चर्चा पाकिस्तान के भीतर प्रशासनिक इकाइयों की संख्या और अधिकारों में संभावित बदलाव से जुड़ी है. इससे राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदल सकता है, लेकिन यह अपने आप राष्ट्रीय विघटन का संकेत नहीं है.

हां, क्षेत्रीय पहचान, संसाधनों के वितरण और केंद्र-प्रांत संबंधों को लेकर असहमति किसी भी पुनर्गठन को संवेदनशील बना सकती है. स्थानीय सहमति के बिना बदलाव करने की कोशिश राजनीतिक तनाव बढ़ा सकती है.

फिलहाल तथ्य यह है कि पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने पर बहस मौजूद है, जबकि उसे 15 स्वतंत्र देशों में बांटने की कोई योजना उपलब्ध रिपोर्टों से प्रमाणित नहीं होती. असीम मुनीर के कथित समर्थन की पुष्टि के लिए मूल रिपोर्ट और प्रत्यक्ष आधिकारिक बयान की जांच भी जरूरी है.

आखिरकार, पाकिस्तान के सामने असली चुनौती नक्शे पर नई सीमाएं खींचने की नहीं, बल्कि सत्ता, संसाधन और जवाबदेही को नागरिकों तक पहुंचाने की है. यदि नए प्रांत इस दिशा में ठोस सुधार लाते हैं, तो प्रस्ताव का मूल्यांकन उसके परिणामों से होगा. लेकिन यदि पुनर्गठन केवल राजनीतिक शक्ति के समीकरण बदलता है, तो प्रशासनिक सीमाएं बदलने के बावजूद शासन की बुनियादी समस्याएं बनी रह सकती हैं.

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