रूस में प्लेग का खतरा? लैब में रिसर्चर की मौत के बाद बढ़ी चिंता, 200 लोगों को किया गया है क्वारंटीन
साइबेरिया में करीब 200 लोगों को एहतियात के तौर पर क्वारंटीन में रखा गया है. पीटीआई के मुताबिक शिपिलोवा की तबीयत काम के दौरान बिगड़ी थी और 2 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई. लेकिन उनकी बीमारी और मौत की सटीक परिस्थितियां अभी स्पष्ट नहीं हैं.
रूस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पिछले सप्ताह सोशल मीडिया पर दावा किया था कि शिपिलोवा की "प्लेग से मौत हुई है." बाद में उन्होंने अपने पोस्ट में बदलाव करते हुए इसमें "संभवतः" शब्द जोड़ दिया. इसके बाद रूस की स्वास्थ्य निगरानी संस्था ने कहा कि उनकी मौत "अज्ञात कारण से हुए निमोनिया" के कारण हुई.
स्थानीय मीडिया में ऐसी खबरें भी आईं कि जिस प्रयोगशाला में शिपिलोवा काम करती थीं, वहां हुई एक दुर्घटना के बाद वह संक्रमित हुई थीं. यह प्रयोगशाला साइबेरिया और सुदूर पूर्व का इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट है. हालांकि, इन खबरों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है.
प्लेग क्या है और कैसे फैलता है?
प्लेग ‘यर्सिनिया पेस्टिस’ नामक बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है. यह बैक्टीरिया आम तौर पर जमीन पर रहने वाले चूहों और प्रेयरी डॉग जैसे जीवों में पाया जाता है. हालांकि, यह इंसानों को भी संक्रमित कर सकता है.
यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया प्लेग के तीन प्रमुख रूप पैदा कर सकता है - ब्यूबोनिक प्लेग, सेप्टीसीमिक प्लेग और न्यूमोनिक प्लेग.
ब्यूबोनिक प्लेग
प्लेग का सबसे आम रूप ब्यूबोनिक प्लेग है. यह आम तौर पर संक्रमित जानवरों से इंसानों में पिस्सुओं (छोटे कीड़े) के जरिए फैलता है.
इसमें शरीर की लसीका ग्रंथियों में सूजन आ जाती है, जिसे ‘ब्यूबो’ कहा जाता है. इसके अलावा बुखार, सिरदर्द, ठंड लगना और कमजोरी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं.
अगर इसका इलाज एंटीबायोटिक से न किया जाए तो ब्यूबोनिक प्लेग कुछ ही दिनों में जानलेवा हो सकता है. बिना इलाज के इस रूप से संक्रमित करीब 30 से 60 प्रतिशत लोगों की मौत हो सकती है.
सेप्टीसीमिक प्लेग
सेप्टीसीमिक प्लेग तब हो सकता है जब ब्यूबोनिक प्लेग का इलाज न किया जाए. संक्रमण सीधे रक्तप्रवाह में पहुंचने पर भी यह स्थिति पैदा हो सकती है.
इसमें शरीर के अलग-अलग अंगों में रक्तस्राव हो सकता है. इसका नाम गंभीर रक्त संक्रमण ‘सेप्टीसीमिया’ से जुड़ा है, जो इस बीमारी में हो सकता है.
न्यूमोनिक प्लेग
रूस में शिपिलोवा की मौत के संभावित कारण के तौर पर जिस न्यूमोनिक प्लेग की चर्चा हो रही है, वह प्लेग का सबसे दुर्लभ लेकिन सबसे गंभीर रूप है. हालांकि, इस मामले में यह अभी तक मौत का पुष्ट कारण नहीं है.
न्यूमोनिक प्लेग तब हो सकता है जब ब्यूबोनिक प्लेग का संक्रमण फेफड़ों तक पहुंच जाए. लेकिन यह संक्रमण सीधे भी हो सकता है और एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सांस के साथ निकलने वाली बेहद छोटी बूंदों के जरिए फैल सकता है.
इसमें गंभीर निमोनिया हो सकता है. यहां निमोनिया का मतलब बैक्टीरिया के कारण फेफड़ों में होने वाला संक्रमण है.
अगर न्यूमोनिक प्लेग का इलाज न किया जाए तो इससे मृत्यु की दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है.
क्या प्लेग सिर्फ पुराने समय की बीमारी है?
प्लेग को अक्सर इतिहास के पुराने दौर की की महामारी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह बीमारी सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है.
541 से 750 ईस्वी के बीच पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ब्यूबोनिक प्लेग ने करोड़ों लोगों की जान ली थी. इसे जस्टिनियन प्लेग के नाम से जाना जाता है.
इसके बाद मध्यकाल में फैली ‘ब्लैक डेथ’ महामारी ने यूरोप की करीब आधी आबादी की जान ले ली थी.
मध्यकाल के बाद भी प्लेग के प्रकोप जारी रहे. 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत के बीच फैली तीसरी महामारी में करीब 1.2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी.
आज भी मध्य एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और साइबेरिया के कुछ हिस्सों में प्लेग स्थानिक बीमारी है. इसका मतलब है कि इन इलाकों में यह बीमारी लगातार एक निश्चित स्तर पर मौजूद रहती है.
प्लेग के मामले आम तौर पर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में सामने आते हैं. इसलिए किसी शहरी क्षेत्र में स्थित प्रयोगशाला से इसके संभावित रिसाव की आशंका को असामान्य माना जाएगा.
क्या प्लेग का इलाज संभव है?
हां, प्लेग का इलाज संभव है. संक्रमण के बाद जल्द इलाज शुरू कर दिया जाए तो आम तौर पर 10 से 14 दिनों तक एंटीबायोटिक देकर इसका इलाज किया जा सकता है.
एंटीबायोटिक मुंह के जरिए या नस के माध्यम से दी जा सकती हैं. हालांकि, 1995 के बाद से जंगलों में पाए जाने वाले कुछ प्लेग बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोध देखा गया है.
सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने 1980 के दशक में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी प्लेग बैक्टीरिया भी तैयार किए थे.
लेकिन फिलहाल ऐसा कोई सबूत नहीं है कि शिपिलोवा की मौत के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी था. इसी तरह, ऐसा भी कोई प्रमाण नहीं है कि जिस प्रयोगशाला में वह काम करती थीं, वहां जैविक हथियारों पर शोध हो रहा था.
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क्या रूस में महामारी फैलने का खतरा है?
मौजूदा जानकारी के आधार पर फिलहाल बड़े पैमाने पर महामारी फैलने की आशंका के बहुत कम सबूत हैं.
न्यूमोनिक प्लेग के बड़े प्रकोप का अब तक सिर्फ एक मामला दर्ज किया गया है. यह 1910 के दशक में चीन में हुआ था.
साइबेरिया में सामने आए मौजूदा मामले को लेकर अभी कई बातें स्पष्ट नहीं हैं. यह भी पूरी तरह साफ नहीं है कि शिपिलोवा किस तरह संक्रमित हुईं और उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सोमवार को कहा कि उसे इरकुत्स्क में एक प्रयोगशाला कर्मचारी की "गंभीर निमोनिया से मौत" की खबरों की जानकारी है. हालांकि, WHO ने कहा कि मौत के कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
WHO के मुताबिक, उपलब्ध अनौपचारिक जानकारी के आधार पर आम आबादी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य का जोखिम फिलहाल कम दिखाई देता है. संगठन ने कहा है कि और जानकारी मिलने के बाद वह जोखिम का आकलन करेगा.
सबसे बड़ा सवाल क्या है?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिपिलोवा आखिर किस तरह बीमार पड़ीं और उनकी मौत की वास्तविक वजह क्या थी.
अगर न्यूमोनिक प्लेग की पुष्टि होती है तो यह जानना जरूरी होगा कि संक्रमण कहां से आया, क्या किसी प्रयोगशाला दुर्घटना से इसका संबंध था और क्या संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए अन्य लोगों पर कोई खतरा है.
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर आम आबादी के लिए जोखिम कम माना जा रहा है. लेकिन इस जोखिम का सही आकलन करने के लिए शिपिलोवा की बीमारी और मौत से जुड़ी स्पष्ट, पारदर्शी और आधिकारिक जानकारी सामने आना जरूरी होगा.
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