अमेरिका के सख्त फैसले से TCS, इन्फोसिस समेत बड़ी भारतीय कंपनियों पर शिकंजा, क्यों बढ़ी IT प्रोफेशनल्स की चिंता?

Oct 09, 2026 - 11:52
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अमेरिका के सख्त फैसले से TCS, इन्फोसिस समेत बड़ी भारतीय कंपनियों पर शिकंजा, क्यों बढ़ी IT प्रोफेशनल्स की चिंता?

big jolt to IT companies in USA

अमेरिका ने गुरुवार को कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी आईटी कंपनियों को ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम’ से सस्पेंड कर दिया। अमेरिका के इस फैसले का सीधा असर इन कंपनियों में काम करने वाले हजारों विदेशी कर्मचारियों पर पड़ेगा। ALSO READ: Infosys, TCS, Wipro समेत भारतीय IT कंपनियां Green Card प्रोग्राम से निलंबित

 

क्या है अमेरिकी सरकार का फैसला?

अमेरिकी लेबर सेक्रेटरी कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि मैं दुनिया की कुछ सबसे बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों – कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी – को ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम’ से सस्पेंड कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि लेबर डिपार्टमेंट माइक्रोसॉफ्ट और एडोब को भी इस प्रोग्राम से सस्पेंड कर रहा है। हम इन कंपनियों से जुड़े किसी भी नए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन एप्लीकेशन को स्वीकार नहीं करेंगे और न ही किसी पेंडिंग एप्लीकेशन पर आगे की कार्रवाई करेंगे।

 

आईटी कंपनियों पर अमेरिकी सख्ती से बढ़ी चिंता

उद्योग संगठन नैसकॉम ने गुरुवार को कहा कि इमिग्रेशन (आप्रवासन) और कुशल कर्मचारियों (स्किल्ड टैलेंट) की आवाजाही दो अलग-अलग मुद्दे हैं। इन्हें एक ही नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिका ने टाटा, इन्फोसिस, एचसीएल और विप्रो समेत आठ आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े एक अहम कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है। अमेरिका में भारतीय आईटी कंपनियों के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। इनमें कार्य वीजा की कड़ी जांच और एच-1बी वीजा के आवेदकों के लिए बढ़ती लागत शामिल हैं। ALSO READ: अमेरिका में Microsoft पर H-1B वीजा के दुरुपयोग का आरोप, ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से निलंबित, कई भारतीय कंपनियां भी घेरे में

 

क्या है चिंता की वजह?

300 अरब डॉलर की भारतीय आईटी इंडस्ट्री के सबसे बड़े बाजार, यानी अमेरिका में हाल ही में हुए घटनाक्रम से उन टेक आउटसोर्सिंग कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है जो कुशल पेशेवरों के सीमा-पार आवागमन पर निर्भर हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई यहीं तक सीमित रहेगी या आने वाले दिनों में अमेरिका की ओर से H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को लेकर और सख्त कदम उठाए जाएंगे। अगर प्रतिबंध आगे भी जारी रहता है, तो इसका असर अमेरिकी टेक इंडस्ट्री के साथ-साथ वहां काम कर रहे हजारों विदेशी और भारतीय पेशेवरों के भविष्य पर भी पड़ सकता है।

 

भारत और भारतीय आईटी कंपनियों पर इसका क्या असर होगा?

कर्मचारियों के लिए लंबी अनिश्चितता: जो भारतीय कर्मचारी H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं और परमानेंट रेजिडेंसी (ग्रीन कार्ड) की प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे, उनके लिए मुश्किलें और बढ़ गई हैं। पहले से ही भारी बैकलॉग का सामना कर रहे भारतीयों के लिए यह प्रक्रिया और लंबी या अनिश्चित हो सकती है।

 

भर्ती और हायरिंग स्ट्रैटेजी में बदलाव: चूंकि इन बड़ी कंपनियों पर ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप को लेकर पाबंदियां लगी हैं, इसलिए ये कंपनियां अमेरिका में विदेशी टैलेंट पर अपनी निर्भरता और अधिक तेजी से घटा सकती हैं। इसके बजाय वे अमेरिका में ही स्थानीय कर्मचारियों (Local Hiring) की भर्ती को और बढ़ावा देंगी।

 

ऑफशोरिंग को बढ़ावा: अमेरिकी वीजा नियमों के बार-बार कड़े होने से भारतीय आईटी कंपनियां अपना अधिक से अधिक काम भारत या अन्य देशों (जैसे लैटिन अमेरिका या पूर्वी यूरोप) के डिलीवरी सेंटर्स से ऑपरेट करने के मॉडल पर जोर दे सकती हैं, जिससे ऑन-साइट (On-site) अवसरों में कमी आएगी।

 

कंपनियों के मुनाफे और बिजनेस मॉडल पर असर: हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय आईटी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर नियुक्तियां बढ़ाकर अपनी वीजा निर्भरता को काफी हद तक कम किया है, फिर भी इस तरह के नीतिगत झटकों से शॉर्ट-टर्म में कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च बढ़ेंगे। साथ ही शेयर बाजारों की धारणा पर नकारात्मक असर देखने को मिलता है। 

 

कर्मचारियों पर क्या होगा असर?

श्रम विभाग ने इन कंपनियों के नए PERM आवेदनों को स्वीकार करना और लंबित आवेदनों पर आगे की प्रक्रिया करना बंद कर दिया है, इसलिए जिन कर्मचारियों का ग्रीन कार्ड प्रोसेस शुरू होने वाला था या बीच में अटका हुआ था, उनकी प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए रुक गई है। भारतीयों के लिए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड का बैकलॉग पहले से ही काफी ज्यादा है। अब यह प्रक्रिया और अधिक लंबी और तनावपूर्ण हो जाएगी।

 

बढ़ेगा मानसिक तनाव : अमेरिका में वर्षों से रह रहे और टैक्स चुका रहे परिवारों के लिए यह स्थिति अनिश्चितता और मानसिक तनाव पैदा करती है। अमेरिका में स्थायी रूप से बसने (Permanent Residency) का सपना देख रहे प्रोफेशनल्स को अब अपने भविष्य को लेकर कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।

 

तुरंत देश छोड़ने का खतरा नहीं : हालांकि यह आदेश किसी भी मौजूदा H-1B वीजा को सीधे तौर पर रद्द नहीं करता है। जिन प्रोफेशनल्स के पास वैध H-1B वीजा है, वे अमेरिका में रहकर अपनी नौकरी जारी रख सकते हैं। यह आदेश केवल परमानेंट रेजिडेंसी (ग्रीन कार्ड) के पहले चरण यानी लेबर सर्टिफ़िकेशन पर रोक लगाता है।

आमतौर पर H-1B प्रोफेशनल्स अपनी कंपनी बदलने से पहले यह सुनिश्चित करते हैं कि उनका PERM अप्रूव हो चुका हो ताकि उनका प्रायोरिटी डेट सुरक्षित रहे। जो कर्मचारी इन प्रभावित कंपनियों में फंसे हैं, यदि वे दूसरी जगह जाना चाहें तो उन्हें नए सिरे से पूरी प्रक्रिया शुरू करनी होगी। इससे उनके ग्रीन कार्ड की पुरानी 'प्रायोरिटी डेट' खोने का जोखिम पैदा हो सकता है। इससे कर्मचारियों की मोबिलिटी सीमित हो जाती है।

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